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Monday, June 21, 2010

Just formality

पाकिस्तान और बांग्लादेश की टीमें एशिया कप के फाइनल से बाहर हो चुकी हैं और मंडे को अब इनके बीच होने वाला मुकाबला महज फॉर्मेलिटी ही रह गया है, लेकिन इसके बावजूद दोनों टीमें अपनी रेपुटेशन बचाने के इरादे से उतरेंगी. इस वर्थलेस मैच में पाकिस्तान अपने कुछ सीनियर प्लेयर्स को रेस्ट देकर युवाओं को आजमा सकता है. वहीं बांग्लादेश की चिंता उसका मिडिल ऑर्डर है. आफरीदी के मुताबिक टीम मैनेजमेंट और खुद वो भी चाहते हैं कि शोएब 2011 व‌र्ल्ड कप टीम का हिस्सा हों,

आम की ये मिठास असली नहीं नकली है

समर सीजन में फलों के राजा आम की मिठास सभी की फेवरिट होती है. लेकिन ये मिठास आपको कितनी महंगी पड़ सकती है शायद आपको इसका अंदाज भी नहीं. आम की ये मिठास असली नहीं नकली है. कैल्सियम कार्बाइड से पका आम आपको सांस से लेकर कैंसर जैसी बीमारियों का शिकार बना सकता है. सिर्फ 15 रुपए किलो कैल्शियम कार्बाइड से 200 किलो आम कुछ ही घंटो में पकाया जा सकता है. 1954 से कैल्शियम कार्बाइड बैन है लेकिन आज खुले आम इसका यूज फलों और सब्जियों को पकाने में किया जा रहा है.
एक्सपर्ट्स की माने तो कैल्शियम कार्बाइड से आर्सेनिक और फास्फोरस होता है. जिससे पके आम खाने से आपको सांस, ब्रीदिंग प्राब्लम, चक्कर, उल्टी, सिर दर्द, नसे खराब होना, कैंसर और नर्वस डिसीसेज हो सकती हैं.
अगर आम की डंडी हरी है और वो ऊपर से हरा और नीचे से पीला है तो उसे कैल्शियम कार्बाइड से पकाया गया है. ऐसे आम में कहीं कहीं पर व्हाइट पाउडर भी नजर आता है. दशहरी, चौसा, सफेदा और लंगड़ा मार्केट में अभी से अपनी मिठास घोल रहे हैं. जबकि हुस्नआरा, आम खास, लंगड़ा लेट वेराइटी के आम हैं. लेकिन मार्केट में ये आसानी से मिल रहे हैं. इन सभी वैराइटीज को कैल्शियम कार्बाइड से पकाया जा रहा है.
हैलट आईसीयू इंजार्च डॉ. आरती लाल चंदानी बताती हैं कि कैल्शियम कार्बाइड से पका आम कैंसर जैसी बीमारियों का कारण बन सकता है. वहीं फिजीशियन डॉ. संजय मेहरोत्रा बताते हैं कि कई बार कैल्शियम कार्बाइड से पके फल खाने से ब्रीदिंग प्राब्लम और सांस की प्रॉब्लम हो जाती है.
डॉक्टर्स का कहना है कि कैल्शियम कार्बाइड की सहायता से पके आम को नहीं खाना चाहिए. सिटी में उन सभी वैराइटी के पके आम मिल जाएंगे, जिनका पकने का अभी मौसम भी नहीं हुआ है.

फुटबाल सी उछली DTH और केबिल कनेक्शनों की संख्या

फीफा व‌र्ल्ड कप का जादू कानपुराइट्स के सिर चढ़कर बोल रहा है. स्पो‌र्ट्स लवर्स इस फास्ट और एक्शन पैक्ड गेम को एंज्वॉय करने का चांस मिस नहीं करना चाहते. इसे फुटबाल की दीवानगी ही कहेंगे जो पिछले दो महीनों में डीटीएच और केबल कंज्यूमर्स की संख्या डेढ़ गुना तक बढ़ गई है.
फीफा फीवर
मनोरंजन कर विभाग के आंकड़ों के अनुसार सिटी में 27,127 डीटीएच और 1.54 लाख केबल कंज्यूमर्स हो गए हैं, जबकि लास्ट फाइनेंशियल इयर में डीटीएच कंज्यूमर्स 21,012 और 1.10 लाख केबल कंज्यूमर्स थे. कंज्यूमर डीटीएच सर्विस को ज्यादा प्रेफर कर रहा है. इसकी मुख्य वजह है केबल की तुलना में ज्यादा चैनल्स. डिप्टी कमिश्नर राम संवारे ने बताया कि केबल की तुलना में डीटीएच सर्विस लाइफ टाइम होती है. जिसे कहीं भी मूव कराया जा सकता है. दूसरा, रिचार्ज कूपन के माध्यम से मनमाफिक रिचार्ज फैसिलिटी लोगों को पसंद आ रही है. पब्लिक को अट्रेक्ट करने के लिए कुछ कंपनियों ने डिश एंटीना और सेट टाप बॉक्स के दाम घटा दिये हैं. जबकि कई कंपनियां कुछ चैनल्स के लिए फ्री रिचार्ज की सुविधा मुहैया करा रही हैं. जवाहर नगर, गुमटी, गुरूदेव पैलेस, आर्य नगर, आचार्य नगर, जूही, लाजपत नगर, विनायकपुर आदि इलाकों में कुछ केबल ऑपरेटर्स ने व‌र्ल्ड कप तक मंथली रेंटल तक घटा दिया है.

आफत बनकर आती है बरसात

एक ओर जहां मानसून का लोगों को बेसब्री से इंतजार है, वहीं बरसात का नाम सुनते ही वार्ड-57 (नवीन नगर) में रहने वाले लोगों की बेचैनी बढ़ जाती है. ड्रेनेज सिस्टम सही न होने के कारण बरसात उनके लिए किसी आफत से कम नहीं साबित होती. एरिया में जबरदस्त वाटरलागिंग होती है. दुकानों के अंदर तक पानी भरने से शॉपकीपर्स को भी नुकसान उठाना पड़ता है. अंधेरे में डूबी रहने वाली खस्ताहाल रोड से उनकी परेशानियां और भी बढ़ जाती है.
रावतपुर गांव रोड पर रहने वाले राजेश अग्निहोत्री ने कहा कि बारिश में रोड तालाब बन जाती है. घर पहुंचना भी मुश्किल हो जाता है. रफ रोड की वजह से बाइक, रिक्शे पलट जाते हैं. शॉपकीपर अशोक कुमार के मुताबिक बारिश नुकसान लेकर आती है. रोड पर ही नहीं दुकानों के अंदर तक पानी भरने से सामान खराब हो जाता है. शिक्षक नगर में रहने वाले टीचर श्रीकांत शुक्ला गुस्से में कहते है कि यहां सही क्या है. वाटर सप्लाई व सीवेज सिस्टम है नहीं, सड़कें पैदल चलने लायक भी नहीं है. समस्याएं ही समस्याएं है लेकिन कोई सुनने वाला नहीं है. वहीं गणेश नगर के अनिल भाटिया कहते हैं कि सफाई का हाल बहुत ही खराब है. बारिश का सीजन आने वाला है लेकिन नाला सफाई आधी-अधूरी हुई है. ऐसे में वाटर लागिंग से कोई नहीं रोक पाएगा. प्रकाश चंद्र कहते हैं कि कर्बला, आनंदनगर हो फिर रावतपुर गांव के सभी मोहल्लों का हाल खराब है.
पार्षद सुमन गुप्ता के पति धर्मेश कहते हैं कि बेटरमेंट चार्ज न मिलने से केडीए विकास कार्य नहीं कराता है. नगर निगम में अफसरशाही हावी है. बावजूद इसके पार्षद निधि और मेयर, एडमिनिस्ट्रेशन ऑफिसर्स से मिलकर पार्षद कोटे से कई गुना का काम करा चुके है. इलेक्शन जीतने के पहले से ही पार्षद निवास से रावतपुर गांव, मसवानपुर और सरायं को जोड़ने वाली रोड बनाने के लिए प्रयासरत हूं।

मानसून हो गया लेट
उमस भरी गर्मी से बेहाल कानपुराइट्स टकटकी लगाए आसमान की ओर निहार रहे हैं. लेकिन गर्मी उनका पीछा छोड़ने को तैयार नहीं है. संडे को पारा और चढ़ गया. लास्ट ईयर की तरह मौसम वैज्ञानिकों ने टाइम से पहले मानसून आने की संभावना व्यक्त की. लेकिन अब तक कानपुराइट्स बारिश की बौछारों को तरस रहे हैं. इधर गर्मी हैं कि कम होने का नाम नहीं ले रही है. उमस और पारा और भी बढ़ता जा रहा है. संडे को मैक्सिमम टेम्परेचर जहां 43 पर पहुंच गया वहीं मिनिमम 31 को पार कर गया. उमस की वजह से लोग पसीने से तरबतर रहे. लोगों को अब बस केवल बारिश से उम्मीद है. लोगों का मानना है कि भीषण गर्मी से केवल और केवल बारिश ही बचा सकती है. उधर, सीएसए के मौसम वैज्ञानिक डा. अनिरुद्ध दुबे ने बताया कि पिछले दिनों बही पश्चिमी हवा की वजह से मानसून और लेट हो गया है. अब हवा माफिक बह रही है लेकिन उसकी रफ्तार धीमी है. उन्होंने कहा कि फिलहाल दो दिनों तक बारिश की कोई उम्मीद नहीं है. सबकुछ हवाओं के रूख पर निर्भर रहेगा.

Tuesday, June 1, 2010

खुद बचें, सबको बचाएं

मेडिकल कॉलेज के टीबी एंड चेस्ट हॉस्पिटल के एचओडी डॉ. सुधीर चौधरी ने बताया कि लोगों को चाहिए कि वो स्मोकिंग छोड़ दें. साथ ही दूसरों को भी छोड़ने का प्रेशर डालें. कुछ लोग ऑफिस या पब्लिक प्लेस पर स्मोकिंग करने वालों के आस पास होते है जो उससे ज्यादा इफेक्टेड होते है. उन्हें चाहिए कि वो स्मोकिंग करने वाले को तुरंत टोके क्योंकि उस जगह से हटने पर भी कोई फायदा नहीं होता. स्मोकिंग का धुआं एयर में घुल चुका होता है और वापस आने पर फिर से हार्मफुल हो सकता है. स्मोकिंग की आदत इंसान को धीरे-धीरे मौत के करीब ले जाती है. व्यक्ति को पता भी नहीं होता कि हर एक सिगरेट का कश उसकी लाइफ से पांच मिनट छीन रहा है. स्मोकिंग का सबसे पहले असर लंग्स पर पड़ता है. इससे लंग्स के रेशे खराब होने लगते हैं. रेशे खराब होने पर लंग्स को साफ करने की कैपेसिटी भी चली जाती है. इससे खांसी होना और बलगम बनना जैसे लक्षण होने लगते हैं. यह बलगम लंग्स में कलेक्ट होता है जो इंफेक्शन के रूप में उभरता है.