Your Life in Your Hand So Save it Yourself

 अपनी धरती को हम मां कहते हैं. चारों ओर लहलहाती हरियाली, आकाश को छूती पर्वत श्रंखलाएं, तरह-तरह के पशु-पक्षी इस धरती को खूबसूरत बनाते हैं. पर अब इसकी सूरत बदलने लगी है. कहीं टेम्प्रेचर का माइनस 50 डिग्री तक चला जाना तो कहीं बिन मौसम बरसात हो जाना इस बात का संकेत हैं कि हम अपनी धरती के साथ खिलवाड़ कर रहे हैं. हकीकत तो यह है कि हम धरती के साथ ही साथ अपनी लाइफ के साथ भी खिलवाड़ कर रहे हैं, क्योंकि इस अर्थ को होने वाले नुकसान सीधे हमारी लाइफ पर इफेक्ट कर रहे हैं. हमारे सामने बहुत से चैलेंज है, बस समय आ गया है अपनी लाइफ और अर्थ को बचाने का.

अगर धरती की तपन को कम नहीं किया गया तो हम भी खाक हो जाएंगे. डेटा पर नजर डालें तो ग्लोबल वार्मिग के कारण अर्थ के टेम्प्रेचर में 1880 के बाद करीब एक डिग्री बढ़ोतरी हो चुकी है. एटमॉस्फियर में कार्बन डाइऑक्साइड की मात्रा नवबंर 1958 में 313.34 पा‌र्ट्स/मिलियन थी. यह 2009 में करीब 387.41 पा‌र्ट्स/मिलियन हो गई.

इस धरती की तबाही का एक बड़ा कारण ग्लेशियरों की मेल्टिंग भी है. ये ग्लेशियर कितनी तेजी से खत्म हो रहे हैं इसका अंदाजा आप इसी बात से लगा सकते हैं कि आर्कटिक ध्रुव पर सिर्फ 27 ग्लेशियर ही बचे हैं, जबकि 1990 में 150 थे. ग्लेशियर मेल्टिंग के कारण समुद्र का जलस्तर बढ़ता जा रहा है. सदी के अंत तक समुद्र के पानी का स्तर 7 से 23 इंच बढ़ जाएगा. कई रिपो‌र्ट्स में दावा किया गया है कि आने वाले कुछ दशकों में समुद्र के किनारे बसे कई शहर डूब जाएंगे.


कभी आशियाने के नाम पर तो कभी जरूरतों के नाम पर हम जंगलों को काटते जा रहे हैं. अर्थ ऑब्जरवेटरी नासा के मुताबिक वर्तमान में हर साल करीब 3.5 करोड़ एकड़ जंगलों की कटाई होती है. जंगल कटने से फल, फाइबर, कागज, तेल, मोम, कलर, मेडिसिन की कीमतें बढ़ रही हैं. इससे भारत को हर साल करीब 4 लाख करोड़ का नुकसान होता है.

जमीन की असली ताकत उसकी फर्टिलिटी मानी जाती है. लेकिन इस समय मिट्टी की ऊपरी परत हर साल 25 अरब टन कम हो रही है. यही जमीन को उपजाऊ बनाती है. इसमें 13 महत्वपूर्ण पोषक तत्व होते हैं, जो पानी में मिलने के बाद पेड़-पौधों और फसल विकसित करते हैं. इन तत्वों के नष्ट होने से जमीन की फर्टिलिटी खत्म होती जा रही है.

इस धरती पर किसी न्यूक्लियर बम की तरह ही एक खतरनाक बम फटने की ओर बढ़ रहा है. दिन पर दिन घातक होता यह बम कुछ और नहीं बल्कि हमारी पॉपुलेशन है. इस साल हुई जनगणना के अनुसार जहां इंडिया की पॉपुलेशन सवा करोड़ से ऊपर पहुंच गई है, वहीं दुनिया में 6.91 अरब का आंकड़ा पार कर चुकी है. इस बात की भी उम्मीद है कि 2050 तक यह 9.15 अरब हो जाएगी. अगर पॉपुलेशन इसकी स्पीड में बढ़ती रही तो अगले 40 साल में 10 में से सिर्फ एक को ही भरपेट भोजन मिल पाएगा.

Now : 8.1 Crore barrel
2030: 3.9 Crore barrel
धरती को नेचुरल रिसोर्स की जननी कहा जाता है. अगर बात सिर्फ ऑयल की करें तो दुनिया में हर साल करीब 8.1 करोड़ बैरल तेल का उत्पादन होता है. 2030 तक इसके घटकर करीब 3.9 करोड़ बैरल सालाना रह जाने की आशंका है.


जल ही जीवन है, लेकिन अब यह जीवन संकट में आ गया है. दुनिया में आज करीब एक अरब लोगों को पीने लायक पानी नहीं मिलता. 2050 तक करीब तीन अरब लोग बिन पानी या कम पानी में गुजारा कर रहे होंगे. 2025 तक भारत के करीब 60 परसेंट भूजल स्त्रोत पूरी तरह सूख चुके हैं.


Do you know?
दुनियाभर में धरती को बचाने की कोशिशें हो रही हैं. लोगों को जागरुक किया जा रहा है. 1970 में छोटे से समूह अर्थ डे नेटवर्क ने अमेरिका में 22 अप्रैल को अर्थ डे घोषित किया. यूनाइटेड नेशंस ने 2009 में 22 अप्रैल को इंटरनेशनल अर्थ डे के रूप में मान्यता दी.

Your Life in Your Hand So Save it Yourself Your Life in Your Hand So Save it Yourself Reviewed by Brajmohan Saini on 1:32 AM Rating: 5

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