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Saturday, June 27, 2009

स्क्रीनएजर्स को नेट का नशा

IT User

मोबाइल टीवी और अल्ट्रा मोबाइल पीसी अब हकीकत बन चुका है। टचस्क्रीन टेक्नोलॉजी के इस जमाने में स्क्रीनएजर्स नेट सर्फिग, मैसेजिंग और ऑनलाइन गेमिंग से अपना टाइम पास करने लगे हैं। दरअसल, टीनएज ऐसी उम्र होती है, जिसमें शारीरिक और मानसिक बदलाव बडी तेजी से होते रहते हैं। यही कारण है कि टीनएजर्स में तरह-तरह की चीजों को जानने की जिज्ञासा और उन्हें आजमाने की ललक होती है। सच तो यह है कि इस उम्र में जिस काम के लिए मना किया जाता है, वही करने की इनमें जिद पैदा हो जाती है। सवाल उठता है कि टेक्नोलॉजी के नुकसान से खुद को कैसे बचाएं टीनएजर्स?

फिलहाल बात करते हैं, एक ऐसी तकनीक की जिसका नशा टीनएजर्स में छाया हुआ है। जी हां, यह है - नेट का नशा। नेट सर्फिंग में पडने वाले टीनएजर्स का न सिर्फ अच्छा-खासा समय बर्बाद होता है, बल्कि उनका स्वास्थ्य भी इससे खराब होता है। हो भी क्यों नहीं? घंटों-घंटों एक ही जगह बैठे रहने से शरीर तो बिल्कुल जाम हो जाता है ना? बहरहाल, इस बात से भी इनकार नहीं किया जा सकता कि खुद को नई-नई जानकारियों से लैस करने में इंटरनेट से बहुत मदद मिलती है। तो फिर क्या किया जाए? समझदारी इसी में है कि कुछ सतर्कता बरतते हुए तकनीक का बेहतर ढंग से इस्तेमाल किया जाए।

चैटिंग या चीटिंग?

चैटिंग के जरिए नए-नए दोस्त बनाने की ललक में अक्सर चीटिंग होती है। इसके अलावा नेट सर्फिग करते वक्त कभी वायरस आ जाते हैं, तो कभी फालतू की ई-मेल बिन बुलाए मेहमान की तरह आ धमकती हैं।

अब सवाल उठता है कि कोई कैसे करे सेफ सर्फिग? सेफ सर्फिग इतना मुश्किल है नहीं, जितना कि यह लगता है।

कभी भी नेट को यूज करने बैठो, तो अपने पेरेंट्स या टीचर से एक बार जरूर पूछ लो।

अगर कोई तुम्हें फालतू की चीजें मेल करे, तो अपने पेरेंट्स या सीनियर को इसके बारे में जरूर बताओ। ऐसी मेल्स का कभी जवाब मत दो।

अनवांटेड मेल्स को रिसीव नहीं करने का तरीका उसी मेल के नीचे लिखा होता है।

अगर तुम चैट कर रहे हो, तो अपने निक नेम का इस्तेमाल करो। अपना असली नाम आमतौर पर नहीं बताना चाहिए।

अपने स्कूल और घर का एड्रेस भी अपने किसी नेट फे्रंड को मत बताओ, वह इसका गलत इस्तेमाल कर सकता है।

अगर कोई तुम्हारी फोटोग्राफ मांगे, तो साफ मना कर दो।

चैट रूम में कोई तुम से अनाप-शनाप बातें कर रहा हो, तो फौरन चैट रूम से बाहर आ जाओ।

चैट रूम में किसी की बात का भरोसा न ही करो, तो अच्छा।

अगर चैट फ्रेंड तुम्हें कोई बात तुम्हारे पेरेंट्स से बताने को मना कर रहा है, तो समझो कि कोई गडबड है।

किसी अनजान व्यक्ति से मिली मेल्स को खोलने में सावधानी बरतो। अटैचमेंट्स को बिना जाने-समझे डाउनलोड मत करो, क्योंकि उनमें वायरस हो सकता है।

नेट फ्रेंड से पहली मुलाकात

आजकल नेट पर फ्रेंडशिप होने के बाद तुरंत मिलने की प्लानिंग बना ली जाती है। अव्वल तो ऐसी किसी भी योजना को बढावा नहीं देना चाहिए और यदि ऐसा करना भी हो, तो सावधान रहने की आवश्यकता है। मीटिंग तय करने से पहले तुम्हें इसके बारे में अपने पेरेंट्स को जरूर बता देना चाहिए। साथ ही, जब तुम मिलने जाओ, तो किसी दोस्त को अपने साथ ले जा सकते हो।

विशेषज्ञों की राय में मॉडर्न टेक्नोलॉजी जहां एक ओर स्टूडेंट्स कम्युनिटी को हर संभव मदद पहुंचाती है, वहीं इससे नुकसान का खतरा भी बराबर बना रहता है। ऐसे में टेक्नोलॉजी का बेहतर इस्तेमाल करने का हुनर रखने वाले ही चैंपियन कहलाते हैं। मॉडर्न टेक्नोलॉजी का फन के लिए उपयोग करने वालों का अंजाम अच्छा नहीं होता।

जेजे डेस्क

जी हां, यह है - नेट का नशा। नेट सर्फिंग में पड़ने वाले टीनएजर्स का न सिर्फ ,अच्छा-खासा समय बर्बाद होता है, बल्कि उनका स्वास्थ्य भी इससे खराब होता है। ,हो भी क्यों नहीं? घंटों-घंटों एक ही जगह बैठे रहने से शरीर तो बिल्कुल जाम ,हो जाता है ना?

Tuesday, June 23, 2009

कैसे करें पढ़ाई में कंसन्ट्रेट


राहुल बेहद होशियार स्टूडेंट है। लेकिन लगातार अव्वल रहने वाले राहुल का रिजल्ट नवीं क्लास में आकर खराब हो गया है। इससे न केवल राहुल, बल्कि उसके पैरेंट्स, टीचर और उसके दोस्तों को भी काफी हैरानी हुई है। दरअसल, उन सभी को समझ में ही नहीं आ रहा कि आखिर अपनी कक्षा में सबसे होशियार राहुल के साथ ऐसा क्यों हुआ? सच तो यह है कि आगे राहुल के जीवन का सबसे महत्वपूर्ण समय आने वाला है, यानी उसका बोर्ड एग्जाम नजदीक है। ऐसी स्थिति में खराब रिजल्ट होने से सबका परेशान होना स्वाभाविक ही है।

बहरहाल, क्या अब तक आप यह अंदाजा लगा सके हैं कि राहुल के साथ ऐसी परेशानी क्यों हुई? दरअसल, वह जब भी पढाई करने बैठता है, उसके मन में कई तरह के सवाल उठने लगते हैं। कभी वह स्कूल से जुडी बातों के बारे में सोचने लगता है, तो कभी अचानक उसे किसी नए वीडियो-गेम का खयाल आ जाता है। इस तरह राहुल न चाहते हुए भी पढाई में कंसन्ट्रेट नहीं कर पाता। यही वजह है कि इस बार उसका रिजल्ट खराब हुआ है। वैसे, यह परेशानी राहुल के साथ ही नहीं, बल्कि राहुल के कई साथियों यानी आपमें से ज्यादातर बच्चों के साथ भी होती रहती है।

क्यों होता है कंसन्ट्रेशन-ब्रेक

दोस्तो, कहते हैं कि मन बेहद चंचल होता है। आपने भी यह जरूर महसूस किया होगा कि मन में एक साथ कई तरह की बातें तेजी से आती-जाती रहती हैं। ऐसे में किसी एक चीज पर एकाग्र (कंसन्ट्रेट) कर पाना सचमुच आसान नहीं होता! और आप चूंकि अभी स्कूल में हैं, इसलिए इस समय आपके मन में ढेरों सवाल, खास तौर पर स्टडी के समय आते ही होंगे। उदाहरण के लिए स्कूल में किसने और क्यों अमुक बातें कहीं, मैडम ने आपको अमुक मसले पर क्यों डांट दिया, अथवा आपके दोस्त ने जो नया वीडियो गेम लिया, वह कितना शानदार है, कल जो आपने टीवी में देखा था, उसमें क्या खास था? है न!

आपकी उम्र का भी है हाथ

एजुकेशनिस्ट व मैजिकल मैथॅड प्राइवेट लिमिटेड, नई दिल्ली के डायरेक्टर प्रदीप कुमार पढाई में कंसनट्रेट न कर पाने का एक कारण आपकी उम्र को भी मानते हैं। दरअसल, उनका यह कहना है कि सात से चौदह साल के एज-ग्रुप के बच्चों के माइंड एक इम्प्रेसनेबॅल माइंड होता है। यानी ऐसे बच्चों पर किसी भी चीज का जल्दी और तीव्र असर पडता है। यही वजह है कि उन्हें स्टडी के समय कंसन्ट्रेट करने में परेशानी भी होती है। वैसे, कंसन्ट्रेशन-ब्रेक होने के और भी कई कारण होते हैं। जैसे, स्टडी का गलत तरीका, दिनचर्या का सही नहीं होना, डाइट का बैलेंस्ड न होना, आउटडोर ऐक्टिविटीज या खेल-कूद में हिस्सा न लेना आदि।

विल पावर स्ट्रांग हो

महान वैज्ञानिक सर आइजेक न्यूटन ने एक बार कहा था कि यदि कोई मुझसे मेरी कामयाबी का राज पूछता है, तो उसे मैं एक ही सलाह देता हूं कि पहले अपनी एकाग्रता को मजबूत करो। न्यूटन ने ऐसा इसलिए कहा था, क्योंकि उनकी एकाग्रता गजब की थी, जिसका परिणाम आज दुनिया के सामने है। अब यदि न्यूटन की एकाग्रता इतनी अच्छी हो सकती है, तो आपकी क्यों नहीं! लेकिन ऐसा तभी संभव होगा, जब आपका विल पॉवर स्ट्रांग हो। इस बारे में विशेषज्ञ भी यही मानते हैं कि कंसन्ट्रेशन बढाने में आपकी इच्छाशक्ति यानी विल पावर का जबर्दस्त रोल होता है। इसलिए कंसन्ट्रेशन इम्पू्रव करने के जो भी तरीके हैं, उन सबका इस्तेमाल उसी कंडीशन में सफल हो सकता है, जब आपका विल पॉवर बेहद स्ट्रांग हो!

क्या करें

डिस्ट्रॅक्टिव आइडियाज को रोकने में सफल होने पर खुद को रिवार्ड जरूर दें।

हेल्दी फूड्स यानी, कार्बोहाइड्रेट्स, प्रोटीन्स और फाइब्रस युक्त खाद्य-पदार्थो का ही सेवन करें। जैसे- चपाती, मिल्क, फु्रट जूस आदि।

साइक्लिंग, स्विमिंग या जॉगिंग करने से आपका विल पॉवर बढेगा और कंसन्ट्रेशन-लेवॅल में भी इजाफा होगा।

रुटीन फॉलो करें और इसे मेंटेन भी रखें।

पूरी नींद लें।

क्या न करें

एक विषय पढते समय दूसरे विषयों के बारे में न सोचें।

टीवी कम से कम देखें।

पढाई करते समय डिस्ट्रॅक्टिव आइडियाज यानी कुछ खाने, फ्रेंड्स को फोन करने, टीवी देखने आदि से खुद को रोकें।

काउंसलर की टिप्स

जंप-एन के डायरेक्टर और जाने-माने करियर काउंसलर जितिन चावला कंसन्ट्रेशन-लेवल इंप्रूव करने के कुछ खास टिप्स बताते हैं..

रात को एकदम से सोने न जाएं, बल्कि बेड पर कुछ समय तक रिलैक्श होकर माइंड से सभी विचारों को निकालने की कोशिश करें। ऐसा करने से आपको अच्छी नींद आएगी और कंसन्ट्रेशन-लेवल बढेगा।

सुबह उठने के बाद तुरंत काम पर न लग जाएं, बल्कि बेड पर कुछ देर तक के लिए बैठे रहें।

स्टडी करते समय बुक में ही मार्क न करें, बल्कि इसके स्थान पर कॉनेल नोट मेकिंग मेथॅड को फौलो करें। इसके लिए आपको ए-फोर साइज के एक पेपर में दाईं तरफ कुछ खाली जगह छोड दें। हर पैराग्राफ के सेंट्रल आइडिया को यहां लिखें और एक बार पढ लेने के बाद सेंट्रल आइडिया की मदद से ही किसी भी टॉपिक को दोहराएं।

सीमा झा

स्टडी करते समय अचानक दूसरी बातों की तरफ ध्यान जाने से आपकी स्टडी, आपका रिजल्ट और अंतत: आपके भविष्य पर भी बुरा प्रभाव पड़ता है। क्यों होता है आपका कंसन्ट्रेशन ब्रेक और कैसे करें पढ़ाई में कंसन्ट्रेट?

बचाएं अपनी पृथ्वी को

global warming __

आप अक्सर टीवी पर यह समाचार देखते होंगे कि उत्तरी ध्रुव की ठोस बर्फ कई किलोमीटर तक पिघल गई है। इसके अलावा, ओजोन अम्ब्रेला में छेद होने की बात भी आप सुनते होंगे या फिर भयंकर तूफान उठने की खबर पढते या टीवी पर देखते होंगे! देखकर आप जरूर सोचते होंगे कि हमारे पृथ्वी ग्रह पर ऐसा क्यों हो रहा है? दरअसल, इन सभी के लिए इनसानी गलतियां जिम्मेदार हैं, जो ग्लोबल वार्मिग के रूप में हमारे सामने हैं।

क्या है ग्लोबल वार्मिग

पृथ्वी के औसत तापमान में वृद्धि ही ग्लोबल वार्मिग कहलाता है। वैसे, पृथ्वी के तापमान में बढोत्तरी की शुरुआत 20वीं शताब्दी के आरंभ से ही हो गई थी। माना जाता है कि पिछले सौ सालों में पृथ्वी के तापमान में 0.18 डिग्री की वृद्धि हो चुकी है। वैज्ञानिकों का मानना है कि यदि धरती का टेम्परेचर इसी तरह बढता रहा, तो 21वीं सदी के अंत तक 1.1-6.4 डिग्री सेंटीग्रेड तापमान बढ जाएगा।

क्या है ग्रीन हाउस गैस?

हमारी पृथ्वी पर कई ऐसे केमिकल कम्पाउंड पाए जाते हैं, जो तापमान को बैलेंस करते हैं। ये ग्रीन हाउस गैसेज कहलाते हैं। ये प्राकृतिक और मैनमेड (कल-कारखानों से निकले) दोनों होते है। ये हैं- वाटर वेपर, मिथेन, कार्बन डाईऑक्साइड, नाइट्रस ऑक्साइड आदि। जब सूर्य की किरणें पृथ्वी पर पडती हैं, तो इनमें से कुछ किरणें (इंफ्रारेड रेज) वापस लौट जाती हैं। ग्रीन हाउस गैसें इंफ्रारेड रेज को सोख लेती हैं और वातावरण में हीट बढाती हैं। यदि ग्रीन हाउस गैस की मात्रा स्थिर रहती है, तो सूर्य से पृथ्वी पर पहुंचने वाली किरणें और पृथ्वी से वापस स्पेस में पहुंचने वाली किरणों में बैलेंस बना रहता है, जिससे तापमान भी स्थिर रहता है। वहीं दूसरी ओर, हम लोगों (मानव) द्वारा निर्मित ग्रीन हाउस गैस असंतुलन पैदा कर देते हैं, जिसका असर पृथ्वी के तापमान पर पडता है। यही ग्रीन हाउस इफेक्ट कहलाता है।

ग्रीन हाउस गैसों के स्त्रोत

कल-कारखानों, बिजली उत्पादन आदि में फॉसिल फ्यूल (कोल, पेट्रोलियम) के जलने के कारण कार्बन डाईऑक्साइड पैदा होती है। कोयला खदान की खुदाई, तेल की खोज से मिथेन गैस पैदा होती है। साथ ही, नाइट्रोजन फर्टिलाइजर से नाइट्रस ऑक्साइड बनता है। हाइड्रो-फ्लोरोकार्बन, परफ्लोरोकार्बन, सल्फर हेक्सा-फ्लोराइड आदि गैसें आधुनिक कल-कारखानों से निकले कचरे से पैदा होती हैं, जो कि ग्रीनहाउस इफेक्ट को प्रभावित करती हैं।

ग्लोबल वार्मिग के प्रभाव

क्या आप जानते हैं कि ग्लोबल वार्मिग का प्रभाव हमारे जीवन तथा आस-पास के वातावरण पर भी पडता है? समुद्री जलस्तर का बढना, ग्लेशियर का पिघलना, उत्तरी ध्रुवों का सिकुडना आदि ग्लोबल वार्मिग के प्राइमरी परिणाम हैं। इसके अलावा, मौसम में बदलाव, ऋतुओं में परिवर्तन भी ग्लोबल वार्मिग की वजह से ही होते हैं।

ग्लोबल वार्मिग से बचाव

आपने कई बार बडे-बुर्जुगों के मुंह से क्योटो प्रोटोकोल सुना होगा। दरअसल, पृथ्वी के तापमान को स्थिर रखने के लिए दशकों पूर्व काम शुरू हो गया था। लेकिन मानव निर्मित ग्रीन हाउस गैसों के उत्पादन में कमी लाने के लिए दिसंबर 1997 में क्योटो प्रोटोकोल लाया गया। इसके तहत 160 से अधिक देशों ने यह स्वीकार किया कि उनके देश में ग्रीन हाउस गैसों के प्रोडक्शन में कमी लाई जाएगी। आपको यह जानकर आश्चर्य होगा कि 80 प्रतिशत से अधिक ग्रीन हाउस गैस का उत्पादन करने

वाले अमेरिका ने अब तक इस प्रोटोकोल को नहीं माना है।

इन्हें भी जानें

ग्लोबल वार्मिग का प्रभाव

ओशन एसिडिफिकेशन (समुद्र अम्लीकरण) : वातावरण में कार्बन डाईऑक्साइड के बढने से समुद्र में भी इनकी मात्रा बढ जाती है। समुद्र का पानी घुले हुए co2 से रिएक्ट कर कार्बनिक एसिड बनाता है, जिससे समुद्र का पानी अम्लीय हो जाता है। यह एसिड कई समुद्री पौधों को समाप्त कर देता है, जिससे कई छोटे- छोटे जलीय जीव मर जाते हैं।

ग्लोबल डिमिंग : पृथ्वी द्वारा प्रकाश विकिरण में कमी ही ग्लोबल डिमिंग है। वैज्ञानिकों का मानना है कि ग्लोबल डिमिंग की मुख्य वजह मनुष्यों द्वारा निर्मित ग्रीन हाउस गैसेज हैं।

ओजोन परत में छेद: वायुमंडल में कई प्रकार के छतरीनुमा परत होते हैं, जो हानिकारक किरणों से हमारी पृथ्वी को बचाते हैं। उन्हीं परतों में से एक का नाम स्ट्रैटोस्फेयर है। दरअसल, यह ओजोन परत है, जो सूर्य की हानिकारक अल्ट्रावॉयलेट किरणों को धरती पर पहुंचने से पहले ही सोख लेती है। वैज्ञानिकों की खोज के मुताबिक सौ वर्षो में 4 प्रतिशत की दर से ओजोन की परत घट रही है। इसे ओजोन छिद्र नाम दिया गया है।

स्मिता

हाल ही में वैज्ञानिकों ने यह खोज की है कि ग्लोबल वार्मिग की वजह से आर्कटिक की बर्फ बड़ी तेजी से पिघल रही है। यदि बर्फ पिघलने की रफ्तार इसी तरह जारी रही, तो महासागरों में पानी बढ़ने के कारण दुनिया के अधिकांश टापू-देश डूब जाएंगे। क्या आप जानते हैं कि ग्लोबल वार्मिग क्या है?


फास्ट फूड्स यमी-यमी!

फास्ट फूड यानी ऐसा भोजन, जिसे बहुत ही कम समय में तैयार किया जा सकता है। इस फूड्स की खासियत यह है कि इसे कभी-भी और कहीं-भी आसानी से परोसा भी जा सकता है। अब आप सोच रहे होंगे कि इतने यमी-यमी फूड्स की शुरुआत कहां से हुई है? दरअसल, फास्ट फूड खाने का प्रचलन सबसे पहले ग्रेट-ब्रिटेन में शुरू हुआ था। आओ सबसे पहले तुम्हें बताते हैं फास्ट फूड्स की कुछ रोचक बातें..

सैंडविच की कहानी

वर्ष 1762 में जॉन मोंटागु नाम का एक अंग्रेज व्यापारी हुआ करता था। उसे काम करने के दौरान अक्सर भूख लग जाती थी। वह सोचता था कि मुझे कुछ ऐसा खाने को मिले, जो हल्का-फुल्का और टेस्टी भी हो। एक दिन घर में बैठे-बैठे उसके दिमाग में यह योजना आई कि क्यों न भूने और सूखे मीट के छोटे-छोटे टुकडों को एक ब्रेड में लपेट कर खाया जाए? बस तैयार हो गई लाजवाब सैंडविच (फास्ट फूड)! ब्रिटेन से ही सैंडविच का स्वाद अन्य देशों में भी फैला। ंîअलग-अलग देशों ने अपने-अपने यहां प्रचलित स्वाद के अनुसार सैंडविच को मॉडीफाई कर खाना शुरू कर दिया। क्या तुम्हें पता है कि दुनिया भर में फास्ट फूड के रेस्टोरेंट सबसे अधिक यूनाइटेड किंगडम में ही हैं? दूसरे स्थान पर ऑस्ट्रेलिया और तीसरे स्थान पर है अमेरिका।

पिज्जा का इतिहास

हम सभी जानते हैं कि 19वीं शताब्दी में इटली से पिज्जे का स्वाद पूरी दुनिया में फैला। एक कहानी के अनुसार, पर्सिया के राजा डेरियस के सिपाहियों ने सबसे पहले पिज्जा बनाया था। सिपाहियों ने एक अलग प्रकार के ब्रेड के टुकडे पर कुछ चीज के टुकडे, कुछ जडी-बूटियां, प्याज-लहसुन की कतरनें आदि से रैप कर खाना शुरू किया। वास्तव में, ऑवन बेक्ड गोल ब्रेड के टुकडों को टमाटर, मॉजरेला चीज, टमाटो सॉस आदि से कवर कर मॉडर्न पिज्जा तैयार किया जाता है।

हो सकते हैं मोटू

अपोलो हॉस्पिटल में सीनियर कंसल्टेंट डा. प्रेम नारायण दूबे के अनुसार, फास्ट फूड खाने में बहुत अच्छा जरूर लगता है, लेकिन ये न्यूट्रिशियस नहीं होते हैं। दरअसल, जाडे के दिनों में हमारी बॉडी की ऐक्टिविटीज कम हो जाती है। जैसा कि हम सभी जानते हैं कि फास्ट फूड में फैटी चीजें जैसे मैदा, तेल आदि अधिक मात्रा में होता है। इसलिए इन्हें खाने से हम बहुत अधिक कैलोरी गेन कर लेते हैं। दूसरी ओर, हमारी ऐक्टिविटी जैसे-खेलना-कूदना, घूमना आदि कम हो जाता है। इसलिए हम कैलोरी खर्च नहीं कर पाते हैं। इसका नतीजा यह होता है कि हम मोटे होने लगते हैं। बाद में यही मोटापा बच्चों में डायबिटीज, दिल से जुडी हुई बीमारी, तनाव आदि का कारण बनने लगता है। इस बात का कोई दबाव नहीं है कि आप फास्ट फूड खाना बिल्कुल छोड दें। रोज खाने में दूध-दही, दाल-चावल और एक फल जरूर लें। वीक-एंड पर आप अपना फेवॅरिट फास्ट फूड लें। अरे हां, यदि आप मोटू नहीं कहलाना चाहते हैं, तो रोजाना फास्ट फूड खाने से बचना चाहिए।

कैलोरी गेन अधिक

एक हेल्दी व्यक्ति के लिए दिन भर में लगभग दो हजार कैलोरीज की आवश्यकता पडती है। दरअसल, जब हम एक पिज्जा या बर्गर, ढेर सारे फ्राइज और एक बडा ग्लास कोल्ड ड्रिंक पीते हैं, तो हम एक बार में ही लगभग 1450 कैलोरीज ग्रहण कर लेते हैं। इससे आप अनुमान लगा सकते हैं कि फास्ट फूड का सेवन कितना हानिकारक हो सकता है! जी.एम.मोदी हॉस्पिटल की डाइटीशियन शैरोन अरोडा के अनुसार, बच्चे यदि चाहें, तो ब्रेड के ऊपर पनीर, फ्रूट्स, सलाद, डिफरेंट सॉसेज आदि को डेकोरेट कर खा सकते हैं। यह भी उन्हें पिज्जा के समान ही डेलिशस लगेगा। इस बात का हमेशा ध्यान रखें कि यदि आप खूब फास्ट फूड खाएंगे, तो न केवल आप मोटे हो जाएंगे, बल्कि कुछ बीमारियों की चपेट में भी आप आ सकते हैं! साथ ही, आपकी पर्सनैल्टी पर भी इसका असर पडेगा। आपको क्लास में बच्चे मोटू-मोटू कहकर भी पुकार सकते हैं। दौड कर खेलने वाले खेल में आप हिस्सा ले ही नहीं सकते! तो दोस्तो, क्या आप तैयार हैं केवल सनडे को फास्ट फूड-डे बनाने के लिए?

स्मिता

बर्गर, पिज्जा, पेस्ट्री और चाउमीन! यमी-यमी! कितने डिलिशस फूड्स हैं ये। इन सभी फास्ट फूड्स का नाम लेते ही आपकी जुबान पर ये शब्द और मुंह में पानी आना लाजिमी है। यह सच है कि ये सभी टेस्टी फूड्स हैं। लेकिन दोस्तो, न केवल जाड़े में, बल्कि हमेशा थोड़ा संभलकर हमें इन्हें खाना चाहिए। क्यों?

साइंस और टेक्नोलॉजी का कमाल 3 जी

रचना आज काफी खुश है। उसके खुश होने की एक खास वजह है। दरअसल, उसने पापा के मोबाइल से अपनी फ्रेंड शुभा को रिकॉर्डेड ट्रैवॅलिंग वीडियो भेजा है। आप सोच रहे होंगे कि जरूर उसके पापा का मोबाइल बहुत हाई-फाई होगा! इसलिए रचना रिकॉर्डेड प्रोग्राम भेजने में सफल हो पाई। क्योंकि साधारण मोबाइल से केवल फोटो क्लिपिंग्स भेजना ही संभव हो पाता है। दरअसल, यह हाई-फाई मोबाइल का नहीं, बल्कि उसके 3जी नेटवर्किग सेवा का ही कमाल है।

3 जी मोबाइल नेटवर्किग

3 जी, यानी थर्ड जेनरेशन मोबाइल नेटवर्किग साइंस ऐंड टेक्नोलॉजी का कमाल है। वर्तमान समय में हम वायरलेस नेटवर्किग (वाइड एरिया वायरलेस वॉयस टेलीफोनी) की सहायता से सिर्फ कॉल रिसीव करते हैं या एसएमएस, एमएमएस भेज पाते हैं। इसमें नेटवर्किग पावर कैपेसिटी 2.5जी (गिगाबाइट) होता है। वहीं, 3जी का नेटवर्किग पावर कैपेसिटी 3 गिगाबाइट होता है। यही वजह है कि इसकी सहायता से वीडियो, ग्राफिक्स, मूवी, इम्र्पोटेंट डेटाज आदि को मोबाइल फोन से दूसरे मोबाइल फोन पर कुछ ही सेकेंड्स में भेजा जा सकता है।

तेज डेटा रिसीविंग स्पीड

3जी नेटवर्क वाइड एरिया सेल्यूलर टेलीफोन नेटवर्क भी कहलाता है। इसकी डेटा रिसीव करने की स्पीड सामान्य मोबाइल से काफी अधिक, यानी लगभग 40 गुणा होती है। वास्तव में, इसकी डाउनलिंक स्पीड 14.4 एमबिट/ सेकेंड और अपलिंक स्पीड 5.8 एमबिट/सेकेंड होती है। यही वजह है कि अन्य नेटवर्क की अपेक्षा यह नेटवर्किग टेक्नोलॉजी न केवल बहुत ही कम समय में ही इंटरनेट से जुड जाता है, बल्कि वीडियो टेलीफोनी भी इससे आसानी से संभव हो पाता है। यहां तक कि आप इसके माध्यम से लाइव टीवी प्रोग्राम भी देख सकते हैं।

डाउनलिंक और अपलिंक

एक ऐसा लिंक, जिसके माध्यम से पृथ्वी से सैटेलाइट तक संदेश भेजा जाता है, डाउनलिंक कहलाता है। वहीं, एक ऐसा लिंक, जिसमें सैटेलाइट से पृथ्वी तक संदेश भेजा जाता है, अपलिंक कहलाता है। दरअसल, अपलिंकिंग के माध्यम से ही सेल फोन से सेल साइट तक किसी भी संदेश को ट्रांसमिट किया जाता है।

जापान है 3जी का जन्मदाता

सबसे पहले जापान में 3जी नेटवर्किग सिस्टम का इस्तेमाल हुआ था। इस नेटवर्किग सिस्टम को जापान की एनटीटी डोकोमो कंपनी ने बाजार में वर्ष 2001 में उतारा था। जापान से ही 3जी नेटवर्किग यूरोप, यूनाइटेड स्टेट्स ऑफ अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया आदि तक फैला। अब भारत में भी यह सुविधा उपलब्ध हो चुकी है। हालांकि यह नेटवर्किग सिस्टम महंगा है, इसलिए हो सकता है कि भारत में इसे लोकप्रिय होने में थोडा समय लगे!

सावधानी

दोस्तो, यह सच है कि मोबाइल फोन के जरिए हम दूर बैठे अपने दोस्तों और रिश्तेदारों से बात कर लेते हैं। लेकिन ध्यान रखें कि मोबाइल पर अधिक देर तक बातचीत करना स्वास्थ्य के लिए हानिकारक भी हो सकता है। साथ ही, यह आपके समय को भी नष्ट करता है। इसलिए यदि आपके घर में 3जी मोबाइल नेटवर्किग सेवा उपलब्ध है, तो इसका दुरुपयोग न करें।

वर्ष 1973 में अमेरिका में पहला सेलफोन बना।

एसएमएस को शॉर्ट मैसेज सर्विस कहा जाता है।

ब्रिटेन के नील पेपवर्थ ने पहला एसएमएस मेरी क्रिसमस लिखकर अपने मित्र को भेजा था।

वर्तमान में हम अपने मोबाइल के लिए जिस वायरलेस नेटवर्क का प्रयोग करते हैं, वह सेल्यूलर नेटवर्क कहलाता है।

सेल्यूलर नेटवर्क एक रेडियो नेटवर्क है, जो कई रेडियो सेल्स से बना होता है।

प्रत्येक रेडियो सेल्स निश्चित ट्रांसमीटर से जुडे होते हैं। यह सेल साइट या बेस स्टेशन कहलाता है। प्रत्येक 8-10 किलोमीटर पर सेल साइट बने होते हैं।

रेडियो कॅवरेज प्रदान करने के लिए सेल साइट विभिन्न स्थानों को अलग-अलग कवर करते हैं।

सेल्यूलर नेटवर्क ट्रांस-रिसीवर से भी जुडे होते हैं, जिनका काम कॉॅल कलेक्ट और डिस्ट्रीब्यूट दोनों करना होता है।

माइक्रोवेव एंटीना वाले सेल साइट टावर या ऊंचे बिल्डिंग पर स्थित होते हैं।

सेल साइट केबल कम्युनिकेशन नेटवर्क और स्विचिंग सिस्टम से जुडा होता है।

मोबाइल फोन में लो पावर ट्रांस रिसीवर होता है, जो नजदीकी सेलसाइट को वॉयस और डेटा ट्रांसमिट

करता रहता है।

मोबाइल पर ट्रांसमिट किया हुआ डेटा रिसीव होने के साथ ही फोन की घंटी बज उठती है।

Here mouse decides the Prime Minister



i next reporter
KANPUR (19 March):
अब यह आपके हाथ में है किआप किसे पीएम बनाना चाहते हैं. इसके लिए आपको सांसदों के भरोसेनहीं रहना है, क्योंकि आपके हाथ मेंमाउस है, जो इन्हें सीधे कंट्रोल करसकता है. जी हा! हम बात कर रहे हैंउन ऑनलाइन गेम्स की जो हैदराबादकी कंपनी ने लांच किए हैं. इनमें बसआपको तय करना है कि आप किसकासाथ देते हैं.
यहां मिलेंगे गेम्स
अगर आप नेट यूजर हैं तो अपनेकंप्यूटर पर
www.onlinereal games.com, www.games2win. com/en/arc ade/arcade_singh_is_king.asp पर लॉगइन करके इन गेम्सका मजा ले सकते हैं. आप यहां उनलीडर्स को जिन्हें अब तक सिर्फ टीवीपर बड़े-बड़े बयान देते देखते थे, अपनीकुर्सी बचाने की जंग लड़ते देख सकतेहैं.
मनमोहन, अडंवाणी और मायावती

गेम्स के इस ग्रुप को पॉलिटिकल वॉरनाम दिया गया है. इसके लिए सभीलीडर्स रेस, हर्डल रेस और स्वमिंगकरते भी नजर आएंगे. इन गेम्स मेंसबसे ज्यादा अट्रैक्शन वाले वे गेम्स हैंजिनमें से एक में प्रेजेंट प्राइममिनिस्टर मनमोहन सिंह और बीजेपीकी तरफ से प्रोजेक्टेड प्राइम मिनिस्टरएलके आडवाणी के बीच टग ऑफ वॉरकी जंग होती है. इसमें जो अपनी तरफकुर्सी खिसका ले जाएगा वही जीतेगा. एलके आडवाणी की टीम के अलावातीसरे मोर्चे की लीडर के तौर परमायावती से भी यह जंग लड़ी जाती है. इस गेम के अलावा लोगों को और एकगेम भा रहा है. इसमें प्राइम मिनिस्टरमनमोहन सिंह को माउस की मदद सेहवा में रखे रहने की जरूरत होती हैजितनी देर प्राइम मिनिस्टर हवा मेंरहेंगे उतने ही वोट्स उनकी झोली मेंमाने जाएंगे. हू विंस, हू विंस 2, हू विंसपॉलिटिकल सेगमेंट वॉर, फन वोट, फन वोट 2 और ऐसे कई गेम्स इससाइट पर अवेलेबल हैं. प्रतीक केमुताबिक गेम्स से उन्हें एकसाइकोलॉजिकल संतुष्टि मिलती है. वेस्वयं को गेम्स के माध्यम से उस नेताके करीब पाते हैं जिसे पीएम बनाने केलिए चुनते हैं. बिजनेसमैन अभिषेकके मुताबिक इन गेम्स के जरिए इनपॉलिटिशियंस को नचा सकते हैं, सपना की माने तो इन गेम्स के जरिएलोग अपने कैंडिडेट को जीता हुआमानकर इसी में संतुष्ट हो जाते हैं.

Tuesday, June 2, 2009

Drink and death

inext reporter
KANPUR (19 March): नशा कोई भी हो उसका अंजामतो मौत ही है. शराब के लती दो यूथ्सने सल्फास खाकर मौत का रास्ताअख्तियार कर लिया. दोनों ने तो खुदही शराब में जहर मिला लिया औरजान दे दी. पुलिस ने शवों कोपोस्टमार्टम के लिए भेज दिया.
किया सुसाइड
सचेंडी के हरदेव सिंह पुरवा निवासीसोबरन (45) प्राइवेट नौकरी करताथा. बेटे विजय ने बताया कि सोबरनशराब के आदी था. शराब पीने कोलेकर वाइफ जयरानी से उसकी लड़ाईभी होती रहती थी.
बुधवार शाम सोबरन दोबारा फिर नशेकी हालत में घर लौटा. घर पहुंचते हीउसने पत्नी को मारना-पीटना शुरू करदिया. इतने में वाइफ ने कह दिया किअगर शर्मदार हो तो मुंह दिखाना.
शर्मदार हो तो.
वाइफ के इस अलफाज से सोबरनकाफी परेशान हो गया. घर सेनिकलने के बाद उसने शराब में जहरमिलाकर पी लिया. फैमिली मैंबर्स नेकिसी भी रंजिश से इनकार किया हैं.
जिंदगी से हार मान बैठा
बर्रा के कर्रही गांव निवासी सीओडीवर्कर मोतीलाल की भी लाइफ में नशाजिंदगी का एक हिस्सा बन चुका था. मोतीलाल के तीन बेटे अनुज, अजयऔर रवि हैं. अनुज के मुताबिकमोतीलाल की मां गुलाब देवी से शराबछोड़ने को लेकर अक्सर विवाद होतारहता था. देर शाम मोतीलाल ने शराबमें जहरीला पदार्थ मिलाकर पी लिया. मुंह से झाग निकलता देख घबरायेफैमिली मैंबर्स ने उन्हें ट्रीटमेंट के लिएहैलट में एडमिट कराया, जहां डाक्टरोंने मृत घोषित कर दिया.



कोई नहीं रहेगा प्यासा

समुद्र के खारे पानी को पीने लायक बनाने के लिए साइंटिस्ट्स ने नैनोट्यूब इजाद की है जो अब तक इस्तेमाल होने वाली ट्यूब से पांच गुना तेजी से काम करेगी. स्माल मैग्जीन के अनुसार साइंटिस्ट्स की टीम ने इस नैनोट्यूब को इजाद किया है. बोरोन और नाइट्रोजन अणुओं से बना यह ट्यूब काफी छोटा है. उसका साइज इंसान के एक बाल की मोटाई का 10000वां भाग है.
साइंटिस्ट्स के अनुसार आबादी का चौथाई हिस्सा पीने के पानी की कमी से जूझ रहा है. यह तब है जब हमारे चारों तरफ समुद्र में पानी ही पानी है. खारे पानी में से लवण दूर करना तेजी से असरदार कदम साबित हो रहा है. पानी के फिल्टरेशन और प्योरीफिकेशन के लिए नैनो टेक्निक इस दिशा में क्रांति साबित होगी. टीम के लीडर आस्ट्रेलियन नेशनल यूनिवर्सिटी के टेमसन हिल्डर ने बताया कि इस वक्त जो तरीका अपनाया जाता है उसमें जितनी एनर्जी की जरूरत पडती है वह जरूरत से चार गुना अधिक है.

फॉलो ट्रैफिक रूल्स

Follow Traffic's Rolls



बच्चो, आप अक्सर सडक दुर्घटनाओं के बारे में सुनते होंगे। ऐसा भी संभव है कि आपका कोई फ्रेंड भी रोड ऐक्सिडेंट का शिकार हुआ हो! दरअसल, इसके पीछे न केवल वाहन चालक की गलती होती है, बल्कि हमारी और आपकी लापरवाही भी कम जिम्मेदार नहीं होती है। सच तो यह है कि हम सभी ट्रैफिक रूल्स के बारे में जानते तो हैं, लेकिन सडकों पर जब उन्हें फॉलो करने की बारी आती है, तो भूल जाते हैं। इसलिए यदि आप पैदल, साइकिल आदि से स्कूल जा रहे हैं, या स्कूल-बस से जा रहे हैं, तो उन रूल्स को फॉलो करना होगा। साथ ही साथ, यदि आप अपने मम्मी-पापा के साथ जा रहे हैं, तो उन्हें ट्रैफिक रूल्स को फॉलो करने की याद दिलाने की जिम्मेदारी आपकी है। साथ ही, यदि आप स्कूल के बस -ड्राइवर से आप सभी मिलकर रूल्स फॉलो करने की मिन्नत करेंगे, तो रोड ऐक्सिडेंट जरूर कम हो जाएंगे।

जब आप कहीं जा रहे हों पैदल

क्या आप पैदल ही स्कूल या अन्य किसी स्थान पर जा रहे हैं? यदि हां, तो एक बात का खयाल जरूर रखें कि आप हमेशा सडकों पर बने फुटपाथ पर ही चलें। यदि फुटपाथ नहीं बना है, तो सडक के बिल्कुल दायीं तरफ चलें।

अक्सर आप लोग सडक पर चलते समय जल्दबाजी करने लगते हैं। यदि सडक पर वाहन लगातार आ-जा रहे हों, तो कभी भी रोड क्र ॉस न करें! अपने दायें-बायें, आगे-पीछे देखकर ही सडक पार करें।

क्या आप यह सोचते हैं कि सडकों पर बनी सफेद धारियां उनकी खूबसूरती बढाने के लिए होती हैं? बिल्कुल गलत! दरअसल, ये धारियां जेब्रा-क्रॉसिंग कहलाती हैं, जो पैदल यात्रियों की सुविधा के लिए बनाई जाती हैं।

जहां भी सबवे, फुट-ओवर ब्रिज आदि बना हो, आप उन्हीं का प्रयोग करें, क्योंकि बच्चो! ये आपकी ही सुविधा के लिए तो बना है!

यह अक्सर होता होगा कि यदि पैदल चौडी सडक पार करनी है, तो आप लोग सडक पर दौड लगा देते होंगे! ऐसा बिल्कुल न करें। पहले आधी सडक पार कर लें, फिर सडक पर बने फुटपाथ पर थोडी देर खडे होकर दोनों दिशाओं में आने वाली गाडियों को देख लें। और उसके बाद फिर आधी सडक पार करें।

कभी भी सडक के कोने या कर्व से रोड क्रॉस करने का आइडिया मन में न लाएं। यह संभव है कि तेज गति से आता हुआ वाहन आपको देख न पाए।

आपका सडक पर दौड लगाने का आइडिया बिल्कुल सही नहीं है। ऐसा करते हुए आप न केवल फिसल सकते हैं, बल्कि गिर भी सकते हैं।

कभी भी मोबाइल पर बात करते हुए सडक पार न करें।

बच्चो, यह तो बात हुई, जब आप सडक पर पैदल चल रहे हैं। अच्छा जब आप बस या किसी दूसरे वाहन से यात्रा कर रहे हैं, तब आप किन-किन बातों को ध्यान में रखेंगे?

आइए एक बार उन पर भी नजर डालें..

जब स्कूल जाना हो, बस से

क्या आप स्कूल बस पकडने के लिए रोज लेट हो जाते हैं और दौडकर उसे पकडते हैं? बिल्कुल गलत बात! क्या आप पांच मिनट पहले तैयार नहीं हो सकते? आखिर लाइफ का मामला है, मेरे प्यारे दोस्तो! इसलिए आप समय पर अपने घर से स्कूल बस पकडने के लिए निकल जाएं, ताकि आपको दौडकर अपनी बस न पकडनी पडे।

बस स्टैंड पर हमेशा क्यू में खडे हों। जब बस पूरी तरह रुक जाए, तभी बिना धक्का-मुक्की किए हुए चढें।

मुझे मालूम है, आपको बस पर शोरगुल करना या तेज आवाज में गाना गाना पसंद है। लेकिन ऐसा करना सही नहीं है, क्योंकि इससे बस ड्राइवर का ध्यान दूसरी ओर जा सकता है।

कभी भी रेडलाइट पर बस पर चढने की कोशिश न करें।

यदि आप बस में खडे हैं, तो हैंडेल को जरूर पकडे रहें।

आपको चलती हुई बस से सिर निकालकर हवा खाना अच्छा लगता होगा! लेकिन आपका ऐसा करना कभी-कभी जानलेवा भी साबित हो सकता है।

पापा-मम्मी को याद दिलाएं ट्रैफिक रूल्स की

बच्चो, यदि आप पापा-मम्मी के साथ कहीं जा रहे हैं, तो उन्हें क्या याद दिलाएंगे?

यदि आपके पैरेन्ट्स गाडी ड्राइव करते हुए मोबाइल पर बात कर रहे हैं, तो आप यह जरूर बताएं कि ऐसा करने से उनका माइंड डाइवर्ट हो सकता है और बडी दुर्घटना भी हो सकती है।

आप अपने देश के ट्रायकलर (राष्ट्रीय झंडा)का सम्मान करते हैं। ठीक उसी तरह, आप अपने पैरेंट्स को एक और ट्रायकलर (ट्रैफिक सिग्नल) का सम्मान करने की याद जरूर दिलाएं।

कभी भी आप वाहन चलाने की जिद पापा-मम्मी से न करें।

अब तो आप सोच रहे होंगे कि लगे हाथ बस चालकों से भी रुल्स को फॉलो करने की मिन्नतें कर लूं। तो फिर देर किस बात की!

आप अपने बस चालक से जरूर कहें कि बहुत तेज गति से बस न चलाएं, क्योंकि इससे दुर्घटना होने की संभावना और बढ जाती है।

चालक को यह भी कहें कि वे कसे भी भी बस चलाते समय किसी यात्री से या अपने मोबाइल पर बात न करें।

बच्चो आप चालक से यह जरूर निवेदन करें कि बच्चों के बस से उतरते समय बस का चलाना बिल्कुल बंद कर लें।

जे.जे. डेस्क

(दिल्ली ट्रैफिक के ज्वाइंट कमिश्नर ऑफ पुलिस एस.एन.श्रीवास्तव से बातचीत पर आधारित)
हाल में राहुल और कृष्णा नाम के दो बच्चों ने लोगों की जान बचाने में पुलिस की न केवल बहुत बड़ी मदद की, बल्कि बहादुर बच्चे बनने का सम्मान भी पाया। यदि बच्चो आप भी उनकी तरह समझदार बहादुर बच्चे बनना चाहते हैं, तो ट्रैफिक रूल्स फॉलो करने के साथ-साथ, दूसरों को भी फॉलो करने की सलाह दें। आओ बच्चो, इस अंक में हम ट्रैफिक रूल्स के बारे में जानने की कोशिश करें..