बचाएं अपनी पृथ्वी को

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आप अक्सर टीवी पर यह समाचार देखते होंगे कि उत्तरी ध्रुव की ठोस बर्फ कई किलोमीटर तक पिघल गई है। इसके अलावा, ओजोन अम्ब्रेला में छेद होने की बात भी आप सुनते होंगे या फिर भयंकर तूफान उठने की खबर पढते या टीवी पर देखते होंगे! देखकर आप जरूर सोचते होंगे कि हमारे पृथ्वी ग्रह पर ऐसा क्यों हो रहा है? दरअसल, इन सभी के लिए इनसानी गलतियां जिम्मेदार हैं, जो ग्लोबल वार्मिग के रूप में हमारे सामने हैं।

क्या है ग्लोबल वार्मिग

पृथ्वी के औसत तापमान में वृद्धि ही ग्लोबल वार्मिग कहलाता है। वैसे, पृथ्वी के तापमान में बढोत्तरी की शुरुआत 20वीं शताब्दी के आरंभ से ही हो गई थी। माना जाता है कि पिछले सौ सालों में पृथ्वी के तापमान में 0.18 डिग्री की वृद्धि हो चुकी है। वैज्ञानिकों का मानना है कि यदि धरती का टेम्परेचर इसी तरह बढता रहा, तो 21वीं सदी के अंत तक 1.1-6.4 डिग्री सेंटीग्रेड तापमान बढ जाएगा।

क्या है ग्रीन हाउस गैस?

हमारी पृथ्वी पर कई ऐसे केमिकल कम्पाउंड पाए जाते हैं, जो तापमान को बैलेंस करते हैं। ये ग्रीन हाउस गैसेज कहलाते हैं। ये प्राकृतिक और मैनमेड (कल-कारखानों से निकले) दोनों होते है। ये हैं- वाटर वेपर, मिथेन, कार्बन डाईऑक्साइड, नाइट्रस ऑक्साइड आदि। जब सूर्य की किरणें पृथ्वी पर पडती हैं, तो इनमें से कुछ किरणें (इंफ्रारेड रेज) वापस लौट जाती हैं। ग्रीन हाउस गैसें इंफ्रारेड रेज को सोख लेती हैं और वातावरण में हीट बढाती हैं। यदि ग्रीन हाउस गैस की मात्रा स्थिर रहती है, तो सूर्य से पृथ्वी पर पहुंचने वाली किरणें और पृथ्वी से वापस स्पेस में पहुंचने वाली किरणों में बैलेंस बना रहता है, जिससे तापमान भी स्थिर रहता है। वहीं दूसरी ओर, हम लोगों (मानव) द्वारा निर्मित ग्रीन हाउस गैस असंतुलन पैदा कर देते हैं, जिसका असर पृथ्वी के तापमान पर पडता है। यही ग्रीन हाउस इफेक्ट कहलाता है।

ग्रीन हाउस गैसों के स्त्रोत

कल-कारखानों, बिजली उत्पादन आदि में फॉसिल फ्यूल (कोल, पेट्रोलियम) के जलने के कारण कार्बन डाईऑक्साइड पैदा होती है। कोयला खदान की खुदाई, तेल की खोज से मिथेन गैस पैदा होती है। साथ ही, नाइट्रोजन फर्टिलाइजर से नाइट्रस ऑक्साइड बनता है। हाइड्रो-फ्लोरोकार्बन, परफ्लोरोकार्बन, सल्फर हेक्सा-फ्लोराइड आदि गैसें आधुनिक कल-कारखानों से निकले कचरे से पैदा होती हैं, जो कि ग्रीनहाउस इफेक्ट को प्रभावित करती हैं।

ग्लोबल वार्मिग के प्रभाव

क्या आप जानते हैं कि ग्लोबल वार्मिग का प्रभाव हमारे जीवन तथा आस-पास के वातावरण पर भी पडता है? समुद्री जलस्तर का बढना, ग्लेशियर का पिघलना, उत्तरी ध्रुवों का सिकुडना आदि ग्लोबल वार्मिग के प्राइमरी परिणाम हैं। इसके अलावा, मौसम में बदलाव, ऋतुओं में परिवर्तन भी ग्लोबल वार्मिग की वजह से ही होते हैं।

ग्लोबल वार्मिग से बचाव

आपने कई बार बडे-बुर्जुगों के मुंह से क्योटो प्रोटोकोल सुना होगा। दरअसल, पृथ्वी के तापमान को स्थिर रखने के लिए दशकों पूर्व काम शुरू हो गया था। लेकिन मानव निर्मित ग्रीन हाउस गैसों के उत्पादन में कमी लाने के लिए दिसंबर 1997 में क्योटो प्रोटोकोल लाया गया। इसके तहत 160 से अधिक देशों ने यह स्वीकार किया कि उनके देश में ग्रीन हाउस गैसों के प्रोडक्शन में कमी लाई जाएगी। आपको यह जानकर आश्चर्य होगा कि 80 प्रतिशत से अधिक ग्रीन हाउस गैस का उत्पादन करने

वाले अमेरिका ने अब तक इस प्रोटोकोल को नहीं माना है।

इन्हें भी जानें

ग्लोबल वार्मिग का प्रभाव

ओशन एसिडिफिकेशन (समुद्र अम्लीकरण) : वातावरण में कार्बन डाईऑक्साइड के बढने से समुद्र में भी इनकी मात्रा बढ जाती है। समुद्र का पानी घुले हुए co2 से रिएक्ट कर कार्बनिक एसिड बनाता है, जिससे समुद्र का पानी अम्लीय हो जाता है। यह एसिड कई समुद्री पौधों को समाप्त कर देता है, जिससे कई छोटे- छोटे जलीय जीव मर जाते हैं।

ग्लोबल डिमिंग : पृथ्वी द्वारा प्रकाश विकिरण में कमी ही ग्लोबल डिमिंग है। वैज्ञानिकों का मानना है कि ग्लोबल डिमिंग की मुख्य वजह मनुष्यों द्वारा निर्मित ग्रीन हाउस गैसेज हैं।

ओजोन परत में छेद: वायुमंडल में कई प्रकार के छतरीनुमा परत होते हैं, जो हानिकारक किरणों से हमारी पृथ्वी को बचाते हैं। उन्हीं परतों में से एक का नाम स्ट्रैटोस्फेयर है। दरअसल, यह ओजोन परत है, जो सूर्य की हानिकारक अल्ट्रावॉयलेट किरणों को धरती पर पहुंचने से पहले ही सोख लेती है। वैज्ञानिकों की खोज के मुताबिक सौ वर्षो में 4 प्रतिशत की दर से ओजोन की परत घट रही है। इसे ओजोन छिद्र नाम दिया गया है।

स्मिता

हाल ही में वैज्ञानिकों ने यह खोज की है कि ग्लोबल वार्मिग की वजह से आर्कटिक की बर्फ बड़ी तेजी से पिघल रही है। यदि बर्फ पिघलने की रफ्तार इसी तरह जारी रही, तो महासागरों में पानी बढ़ने के कारण दुनिया के अधिकांश टापू-देश डूब जाएंगे। क्या आप जानते हैं कि ग्लोबल वार्मिग क्या है?


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