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Thursday, July 15, 2010

खून नहीं पीता था ड्रैकुला

पश्चिमी जगत में सदियों से ड्रैकुला लोगों की जिज्ञासा का विषय रहा है. खून के प्यासे इस दरिंदे पर न जाने कितनी कहानियां, कितने किस्से गढ़े गए. उपन्यासों से लेकर फिल्मों तक, ड्रैकुला का डर लोगों को रोमांचित करता रहा. लगभग पांच पीढि़यां, तो ड्रैकुला की कहानियां सुनकर ही बड़ी हुई हैं. सिलसिला बदस्तूर जारी है. बच्चों को आज भी ड्रैकुला की कहानियां सुनाई जाती हैं. वह आज भी उपन्यासों और फिल्मों में अमर बना हुआ है. क्या है ड्रैकुला की सच्चाई?
ऑस्ट्रिया में लगी एक प्रदर्शनी ने इस रहस्य पर से पर्दा उठाने की कोशिश की है. इस प्रदर्शनी में वह सारे प्रमाण मौजूद हैं, जो ड्रैकुला के इतिहास को बयां करते हैं. ड्रैकुला पर केंद्रित इस विशेष प्रदर्शनी के आयोजक माग्रेट रॉक बताते हैं कि यह यह किस्सा 15वीं सदी से शुरू हुआ. 1456 से 1462 के मध्य वलीशिया (रोमानिया) में व्लाद तेपेस नाम का एक युवा शासक था, जो अपने विरोधियों के लिए बेहद क्रूर था. उसने लगभग 50 हजार लोगों को बुरी तरह मौत के घाट उतारा था. बस, यहीं से उसे लोगों ने व्लाद द इम्पेलर और व्लाद ड्रैकुला कहना शुरू कर दिया. इसके बाद वह खून के प्यासे दरिंदे के रूप में भय का पर्याय बना दिया गया. रॉक कहते हैं कि व्लाद अपने विरोधियों को बहुत बुरी मौत देता था, लेकिन वह खून नहीं पीता था. वह सभी के लिए क्रूर भी नहीं था. उसकी प्रजा उसे हीरो मानती थी.

रॉक का मानना है कि कुछ यूरोपीय इतिहासकारों ने जानबूझकर या अनजाने में व्लाद को खून पीने वाला दरिंदा घोषित कर दिया और यह किस्सा सदियों के लिए अमर हो गया. आधुनिक जगत में सन 1897 में ड्रैकुला पर पहला उपन्यास लिखा गया. ब्राम स्टोकर के इस उपन्यास का शीर्षक ही ड्रैकुला था. इसके बाद न जाने कितने उपन्यास और कितनी ही फिल्में अब तक इस किरदार को जीवंत बनाए हुए हैं.

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