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Wednesday, November 4, 2009

शिक्षक को कभी हार नहीं माननी चाहिए


गुरू कुम्हार शिष्य कुम्भ है, गढ़ी-गढ़ी काढ़े खोट, भीतर हाथ सहार दें, बाहर बाहे चोट एक शिक्षक अपने शिष्य के जीवन में अहम भूमिका निभाता है. उसके चारित्रिक उत्थान अथवा पतन में उसका योगदान उतना ही अहम होता है जितना एक कुम्हार का घड़े की बनावट में, बदलते युग में शैक्षिक धारणाओं ने भी करवट ली है. आज एक बालक के जीवन में मिठास घोल, उसके मित्र बनकर हम जितना उसका जीवन साकार कर सकते है उतना किसी और तरीके से नहीं. शिक्षा में नए तरीकों को आजमा कर भी हम उनकी जिज्ञासा जागृत कर सकते हैं as change is the essence of life. हमें उनकी बातों को समझ उनमें ज्ञान की अलख जगानी होगी. As the one real object of education is to settle the mind of the young and unflame their intellects. शिक्षक को कभी हार नहीं माननी चाहिए. यह सोचना कि ये कार्य इस बच्चे के बस का नहीं, वास्तव में निराशावाद होना दर्शाता है. मुझमें हमेशा इस विश्वास की ज्योती जलती है कि देर से ही सही पर ये बच्चा जरूर सीखेगा और अंत में मेरे विश्वास की जीत होती है. तब मुझमें अपने यकीन को बनाए रखने का प्रोत्साहन और बढ़ जाता है.
I’l sum up by saying that being freindly, patient confident and loving to teach your subject are the ,1,1ualities of a good teacher who serves his children and ultimately the society.

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