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Wednesday, April 29, 2009

Save Childness

जहां एक तरफ यह सच है कि लाखों-करोड़ों रुपए खर्च करके भी बचपन लौटाया नहीं जा सकता, उसी तरह यह भी सच है कि बिना किसी मेहनत के भी हम अपने बचपन को बचा सकते हैं, अपने अंदर. बचपन यानी बात-बेबात, जोर-जोर से रोना और बिना वजह खिलखिला कर हंस देना. बिना नक्शा पास करवाए ही मिट्टी के महल बनाना और गुस्सा आते ही किसी बुलडोजर सी एक लात मारकर उसे गिराना. अचानक किसी चिड़िया को देखकर खुश हो जाना और उसे सबको दिखाना. गाय को डरते-डरते सहलाना, उसके करीब जाना. यह बचपन ही था, जब मैं खुली आंखों से सपने देखा करता था. वो बचपन ही था जब प्लेन हवा में उड़ता था और उस प्लेन का पायलेट मुंह से आवाज निकालते हुए जमीन पर खड़ा रहता था. एक चॉकलेट सी मीठी और छोटी दुनिया थी हमारी. सपनों पर लगाम लगा दी गई. मैं धीरे-धीरे बड़ा होने लगा, समझदार भी. समझदारी भरी इस दुनिया में सपने यथार्थ से टकराकर टूटने लगे. अब मैं सिर्फ सोती हुई आंखों से सपने देखता हूं. जिंदगी ने ढेर सारा स्ट्रेस दिया है, जिसके चलते खिलखिलाकर हंसना तो दूर मुस्कुराये हुए भी जमाना हो जाता है. कल एक बच्चे को मासूमियत से खिलखिलाता देख दिल को जो सुकून मिला उसे मैं बयान नहीं कर सकता. उसकी मासूम आंखें सीधे मेरी आत्मा को छू रही थीं. बच्चे हमें क्यों अच्छे लगते हैं? न उनके पास पैसा होता है, न पावर होती है. फिर भी हम उनकी तरफ क्यों खिंचे चले जाते हैं? क्योंकि उनके पास भोलापन होता है, सच्चाई होती है. यानी सच्चाई अब तक हमें अट्रैक्ट करती है. शरीर को रेज्युवेनेट करने के कई तरीके ईजाद हो चुके हैं, कई फेस पैक बन चुके हैं. पर क्या कीजिए जब ये आत्मा, ये स्पिरिट, बूढ़ी होने लगे, जिंदगी जीने की आस खोने लगे, थकने लगे? क्या कोई स्पिरिट को रेज्युवेनेट करने का पैक बना है? जी बिल्कुल बना है. घुटन भरे इस माहौल में नेचर इज द बेस्ट हीलर. नेचर के करीब जाइये. सच्ची चीजों के करीब जाइये. बच्चों सी सच्ची स्पिरिट किसी की नहीं होती. इसीलिए आइये बचा लें अपने भीतर का बच्चा. हमारी परेशानी यही है कि हम जिंदगी भर खुश रहना चाहते हैं, बच्चे बने रहना चाहते हैं. लेकिन हमसे हमारी खुशी छीनकर हमें बड़ा बना दिया जाता है. हम पर रिस्पांसिबिलिटी का बोझ डाल दिया जाता है. हम सिर्फ पेट के अंदर तक ही नहीं मां से जुड़े रहते हैं, बल्कि बाहर भी हम हमेशा मां के साये में रहना चाहते हैं. हम जान-बूझकर अपना बपचन कहीं छुपा देते हैं. वो बचपन नहीं हम खुद को खुद से छुपा रहे होते हैं. मेरे एक दोस्त ने एक दिन मुझसे कहा कि मैं दुनिया की भीड़ में खुद को खोना नहीं चाहता. बड़ी अजीब लेकिन सच्ची बात थी कि इस आपाधापी में हम खुद को कब खो देते हैं हमें पता ही नहीं चलता. पर अनजाने में कल उस बच्चे की मुस्कुराहट ने मुझे खुद से मिला दिया. मेरे अंदर के बचपन को उसके बचपन ने खोज निकला. मैं एक बार फिर दिल खोलकर मुस्कुराया. आइये फिर ढूंढें बच्चा बनने का एक मौका, फिर से उस टूटी हुई और थकी हुई आत्मा को रीचार्ज करने मौका. खुद बच्चों के साथ एक बच्चा बन जाने का मौका..खो जाए उनकी खिलखिलाहट में उनकी मासूमियत में. एक बार डूबकर देखिये उनके साथ, उनकी दुनिया में. सच मानिए वापस आने का मन ही नहीं करेगा. आज घर के सारे बिस्तर को फैला दें, किसी पुराने तकिये को फाड़कर बिखरा दें..अपनी बाहें फैलाएं और फिर से बच्चे बन जाएं. तैयार हो जाएं सर झुकाकर किसी की डांट खाने को. आइये बढ़ायें हाथ अपने बचपन की ओर..और उसे संभाल लें प्यार से.

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